​प्रमुख उद्बोधन

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साहित्यकार सम्मान समारोह भोपाल

पूजनीय सरसंघचालक डाॅ. मोहनराव भागवत का उद्बोधन
‘जीवन में अच्छे-बुरे का संस्कार जिन माध्यमों से होता था, उनसे आज हम दूर जा रहे हैं। गाँव में अनपढ़ मिलते हैं जिन्हें तुलसी रामायण कण्ठस्थ है। पूछने पर वे संदर्भ सहित बता सकते हैं। लेकिन उपाधि प्राप्त पढ़े-लिखे विद्वान रामायण की छोटी सी बात भी बताने की स्थिति में नहीं हैं। आधुनिक प्रणाली के तंत्र तथा व्यवस्थाएँ मनुष्य को मनुष्य के विवेक से दूर कर रही हैं। मनुष्य की विशेषता है कि वह अच्छाई की ओर बढ़ता है, बुराई को छोड़ता है। अपनी इस विशेषता को मनुष्य छोड़ दे तो मनुष्य व पशु में अन्तर नहीं रह जाता है। मनुष्य ही है जो जानता है कि मेरे अकेले के ठीक होने से नहीं होगा। सारी दुनिया का हित होगा तभी मैं भी ठीक रह सकूँगा। धर्म ही है जो मनुष्य को जीवन की कला सिखाता है। धर्म से उसे समाधान व शांति मिलती है।

‘जीवन में अच्छे-बुरे का संस्कार जिन माध्यमों से होता था, उनसे आज हम दूर जा रहे हैं। गाँव में अनपढ़ मिलते हैं जिन्हें तुलसी रामायण कण्ठस्थ है। पूछने पर वे संदर्भ सहित बता सकते हैं। लेकिन उपाधि प्राप्त पढ़े-लिखे विद्वान रामायण की छोटी सी बात भी बताने की स्थिति में नहीं हैं। आधुनिक प्रणाली के तंत्र तथा व्यवस्थाएँ मनुष्य को मनुष्य के विवेक से दूर कर रही हैं। मनुष्य की विशेषता है कि वह अच्छाई की ओर बढ़ता है, बुराई को छोड़ता है। अपनी इस विशेषता को मनुष्य छोड़ दे तो मनुष्य व पशु में अन्तर नहीं रह जाता है। मनुष्य ही है जो जानता है कि मेरे अकेले के ठीक होने से नहीं होगा। सारी दुनिया का हित होगा तभी मैं भी ठीक रह सकूँगा। धर्म ही है जो मनुष्य को जीवन की कला सिखाता है। धर्म से उसे समाधान व शांति मिलती है।

            आज प्रगति की आस में मनुष्य दौड़ रहा है, पर वह धर्म को छोड़ कर दौड़ रहा है। इसलिये यह दौड़ अंधी दौड़ हो जाती है। साहित्यकार का काम है कि वह लोगों को सही मार्ग दिखाने वाला साहित्य तैयार करे। सदैव से साहित्यकारों का यही काम रहा है।

            वाल्मीकि का उदाहरण हमारे सामने है। उन्हें आद्य साहित्यकार माना जाता है। व्याध की हिंसा को देख कर वे व्यथित हुए और वेदना से उनके मुँह से शापवाणी निकली। क्रौंच पक्षी को मरता देख उन्हें दुख हुआ। दुख से क्षोभ हुआ और क्षोभ से शापवाणी निकली। उन्हें आश्चर्य हुआ की मेरे मुँह से क्या निकल गया। मैं ऋषि हूँ, मैंने इतना क्षोभ मन में उत्पन्न क्यों होने दिया की मुँह से शापवाणी कैसे निकल गयी। वह वाक्य तो उनका अपना नहीं था। उन्हें बताया गया कि यह ईश्वर की योजना से हुआ है। यह श्लोक रचना हुई है।

            कहा गया है - ‘रसात्मक काव्यम्।’ पहले साहित्य का अर्थ काव्य ही था। रसात्मक काव्य याने साहित्य। वचन, श्रवण, लेखन और मंचन चारों विधाओं में साहित्य है। वाल्मीकि को बताया गया तुम्हें जो प्रतिभा ईश्वर की कृपा से मिली है उसका आवेग पूर्ण होने से पहले उसका सदुपयोग करो। धर्म का संदेश देनेवाले प्रभु राम की कथा लोगों को बताओ।

            एक चर्चा चलती है कला केवल कला के लिये है अथवा जीवन के लिये कला है। हमारे यहाँ इसका निर्णय बहुत पहले हो चुका है। ‘स्वान्त सुखाय बहुजनहितायच’। मनुष्य केवल स्वान्त सुखाय नहीं जी सकता। मनुष्य यदि स्वान्त सुख के लिये जियेगा तो वह राक्षस हो जायेगा। इसलिये स्वान्त सुख के साथ बहुजनहित होना चाहिये। साहित्य का उद्देश्य भी बहुजन हित ही है। इसलिये कला के साथ बहुजनहित का ध्यान रखना होता है। उसके मूल में, व्युत्पत्ति में यह भाव आना चाहिये। साहित्य में हित शब्द है, सहित शब्द भी है। यह साहित्य में रहेगा तो सबका हित होता रहेगा। रसात्मकता के कारण निरसता नहीं रहेगी। यही साहित्य का प्रयोजन है। साहित्यकार अपने स्वान्त सुख के लिये अपनी अनुभूति जनहित के परिप्रेक्ष्य में योग्य बना कर रसात्मक रूप में प्रस्तुत करे। मनुष्य का हित जुड़ने में है। साहित्य लोगों को जोड़े। मनुष्य का हित मानव से अतिमानवत्व, अतिमानवत्व से देवत्व की ओर जाने में ही उसका मानवत्व है। साहित्य इसकी प्रेरणा दे। हमारे भारतवर्ष में सभी भाषाओं के साहित्य में सर्वत्र यह बात मिलती है। बच्चों को बताने की फुटकर कहानियों से लेकर रामायण महाभारत तक में यह दृष्टि देखने को मिलती है।

            बिहार में बुद्धिजीवियों का सम्मेलन था। सब विचारधाराओं के लोग थे। तीन दिन तक बिहार की स्थिति पर चिंतन हुआ कि बिहार की स्थिति खराब क्यों हैं। लोग बिहार छोड़कर क्यों जा रहे हैं। सबने विचार रखे। विचारोपरान्त सब इस बात पर सब सहमत थे कि बच्चों को कहानियाँ बताने वाली दादी-नानी बच्चों के पास नहीं है। उदाहरण के लिये एक कहानी वहाँ बतायी गयी। (गिरगिट की पूछ टूटने की कहानी)। कहानी संदेश देती है कि अपने को बचाना है तो सबसे मिल कर रहना होगा। हमारे साहित्य में बच्चों के मनोरंजन से लेकर जीवन का सत्य जिनमें है ऐसे आर्ष ग्रंथ तक में दी गयी कहानियाँ स्वान्त सुखाय होंगी पर बहुजनहिताय जरूर है। इस दृष्टि से विचार होना चाहिये।

            देश में बहुत समस्याएँ हैं। बहुत विचार-मंथन होता है। खूब होता है। लेकिन सारा विचार-मंथन ऊँगली दूसरे की ओर करके होता है। देश की स्वतंत्रता के 65 साल बाद भी ये बातें इतनी क्यों हो रही हैं? हालांकि हमारा देश सर्वसम्पन्न है। फिर भी इतनी समस्या क्यों हैं? स्वतंत्रता के बाद भी क्यों हैं? मूल बात यह है कि हमारे जीवन का पतन हुआ है। हमारा मूल जीवन समाप्त हो गया है। हमारा जीवन भी हमारा नहीं रह गया है। माताएँ अपने बच्चों को अंग्रेजी में पढ़ाती हैं, विदेशी जानवरों की चित्र कथाएँ दिखाती हैं। हमारे यहाँ जो जीवन पर्यन्त के कर्तव्य हैं वे विदेशी पद्धति से मनाये जा रहे हैं। हम चकाचैंध की भाग-दौड़ में क्या छोड़ रहे हैं, इसका भान हमारे देश में सुविद्य समाज के लोगों को भी नहीं है। होता यह है कि बच्चा पढ़ लिख कर विदेश चला जाता है, माता-पिता घर में अकेले रह जाते हैं। उनकी मृत्यु हो जाने पर भी वह नहीं आ पाता है।

            आज जीवन जैसा बनता जा रहा है, वैसा न होकर मनुष्य का जीवन हो। प्रेममय, संवेदनायुक्त सबको साथ लेकर चलने वाला जीवन होना चाहिये। सबका विचार करनेवाला विकसित जीवन हो। इसके लिये मन का संस्कार चाहिये। संस्कार निर्माण करनेवाले साहित्य से हम दूर होते जा रहे हैं। साहित्य तो कलाकार की संवेदना का अविष्कार है। पश्चिम में कहते हैं साहित्य में वमन होना चाहिये। यथार्थ के नाम पर मन में भड़ास की उल्टी करने का विचार, हमारा विचार नहीं है। इससे वातावरण गंदा होता है, इसकी चिंता नहीं है। यही बात साहित्य में हो रही है। पश्चिम में यह हो रहा है। हमारे यहाँ पश्चिम की नकल का चलन है। इसलिये हमारे यहाँ भी वही हो रहा है। हमारे यहाँ भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वीभत्स रस दिखाते नहीं है, क्रोध दिखाते नहीं हैं। युद्ध दिखाते नहीं हैं। युद्ध हुए हैं उनका वर्णन है पर दिखाते नहीं हैं।

            देखने वाले के मन पर हर बात का संस्कार होता है। अच्छाई के लिये भी हिंसा दिखानी है तो उसे बढ़ चढ़ कर दिखाना ही पड़ता है। मनुष्य सार नहीं देखता है। वह गूदा छोड़ कर छिलका खाता है। इसलिये भरत नाट्यशास्त्र में क्षोभ, हिंसा इत्यादि बातें दिखाने की मनाही की गयी है। लेकिन आज यही सब दिखाया जा रहा है। किसी सामाजिक पर बुराई पर नाटक, सिनेमा आता है, उसमें अभिव्यक्ति काफी भड़काऊ होती है। कहा जाता है कि पापी से द्वेष मत करो पाप से द्वेष करो। कहा जाता है, पर होता उल्टा है। पाप से नहीं पापी से द्वेष उत्पन्न होता है। संघर्ष बढ़ता है। टूटन बढ़ती है।

            साहित्य में यह विकृति घुस गई है। गत सात-आठ दशक से यह हो रहा है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से चली परम्परा बीच में अवरूद्ध हो गयी है। दूसरी धारा में जो कुछ रचा जा रहा है, वह अपनी मूल प्रकृति के विरूद्ध है। अतः अपने मूल को काटने वाला साहित्य रचा गया। वही साहित्य इतने वर्षों से चल रहा है। साहित्य चला तो उस साहित्य के साहित्यकार ही स्थापित हुए। सम्मानित भी वही हुए। इसलिये प्रचलित वही रहे।

            अपनी जड़ों से कटे तथा अपेक्षित संस्कारो के अभाव में हम आधुनिकता के प्रवाह में बहते चले गये। इस कारण विपरीत संस्कारों में फँस गये। आज समाज में जो वातावरण बना है कि दुनिया में जो है वह अपने यहाँ भी है। माना गया कि दुनिया में कोई बीमारी है तो अपने यहाँ भी होगी। बीमारी अपने यहाँ भी आयी। कुछ लोग उसके शिकार हुए। कुछ लोग मरे, कुछ ठीक हो गये। कुछ को थोड़ी रहती है। कुछ ठीक रहते हैं। ऐसा इसलिये होता है कि जिसकी अंदर की मजबूती होती है वह सुरक्षित रहता है। अंदर की मजबूती न रहने पर स्वांस लेने पर भी बीमारी आती है। स्वांस जीवन के लिये आवश्यक है, पर वह भी बीमारी का कारण बन जाती है। अपने देश की परिस्थिति अशांति दिखायी दे रही है, उसमें से लोगों को, देश को उबारना है तो हमें अपनी बातों पर वापिस जाना होगा। उन बातों का महत्व समझाने वाला, उन बातों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करनेवाला, उदाहरणों से उन बातों पर चलने की प्रेरणा देने वाला साहित्य निर्माण करना पड़ेगा।

            आज साहित्य की चर्चा बहुत होती है। साहित्य विधा पर गइराई से चिंतन बहुत होता है। लेकिन प्रयोजन के अनुसार साहित्य की निर्मिति जरूरी है। आज हो भी रही है पर उसे पाश्र्व में ढकेल दिया है। स्थिति यह है कि यदि छपना है तो ऐसा लिखो की हलचल मचे, उधम हो। लिखने के पीछे उद्देश्य भी यही होता है।

            परिस्थिति के कत्र्ता, निर्माता, धत्र्ता हम ही हैं। मनुष्य को बहिर्मुखता से दूर कर अन्तर्मुखता की ओर प्रवृत्त करने वाला साहित्य, चरित्र, उदाहरण, कथा, कहानियाँ, विषय आज की पीढ़ी की मनोदशा को पहचान कर साहित्य निर्माण कर उन तक पहुँचाने वाले लोग चाहिये। ऐसे लोग हैं, उनको स्थापित करने की आवश्यकता है। साहित्य परिषद का यही काम है। ऐसे लोग कहाँ-कहाँ हंै, उन्हें ढूँढ कर संगठित प्रयास खड़ा करना। ऐसे लोग समाज के सामने खड़े करना। संवाद को दिशा देनेवाले ऐसे लोग आगे लाये। इसके अभाव में संस्कारों का लोप हो रहा है। हाल के बीस-तीस वर्षों में यह बढ़ा है। उस कारण स्थिति यह बनी है कि लोगों की पढ़ने की इच्छा ही नहीं रही। केवल पाठयपुस्तकें मजबूरी में पढ़ते हैं। क्योंकि उन्हें न पढ़ने पर नौकरी नहीं मिलती। अर्थात स्वार्थ के लिये पढ़ते हैं। जीवन में केवल स्वार्थ नहीं चाहिये। अच्छा साहित्य भी पढ़ना चाहिये।

            रामकृष्ण परमहंस ने बचपन में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। उन्होंने कहा था नून-तेल-लकड़ी की पढ़ाई नहीं करूँगा। ऐसी पढ़ाई नहींे की, परन्तु सारी दुनिया को जीवन की शिक्षा देने वाले शिष्य तैयार किये। विवेकानन्द, गांधीजी मेरिट वाले नहीं थे। तिलक जी ने राष्ट्र के लिये कार्य करने की इच्छा से शरीर सुदृढ़ करने के लिये एक वर्ष पढ़ाई छोड़ी थी। व्यायाम कर स्वयं का देह वज्रदेह बनाया, फिर पढ़ाई प्रारंभ की। समाज को दिशा देने वाले महानायकों की दृष्टि क्या थी हमें समझना चाहिये। ऐसे भी उदाहरण है जो इसके विपरीत आगे बढ़े। वे भी अपने मूल से कटे नहीं थे। समाज की यही दिशा होनी चाहिये।

            यह बात विद्यालय चलाने वालों को भी समझ में आनी चाहिये। बच्चों को हम्पटी-डम्पटी पढ़ाया जाता है। पर उसमें संदेश क्या है। ‘शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धन सम्पदा’ पढ़ाया जायेगा उससे बच्चों को अच्छा संदेश मिलेगा। वह संदेश संपूर्ण मनुष्यता को जोड़नेवाला बनाता है। ऐसा संदेश हमारे पास है। वाल्मीकि के समय से चली आ रही समृद्ध परम्परा है, जिसे आज भी माना जाता है। उस परम्परा के कौन-कौन हैं, उनको एकत्र करना। नये साहित्यकारों की पीढ़ी तैयार करना। ऐसे साहित्यकारों को दुनिया में स्थापित करना। ऐसे साहित्यकार के आधार पर समाज के भटके प्रवाह को योग्य सही दिशा देने वाले  प्रबोधों की पीढ़ी तैयार करना। ऐसा करने की शुरूआत के रूप में साहित्य परिषद का प्रयोजन है। इसी कड़ी में यह कार्यक्रम है। 14 लोगों को सम्मानित किया है। हमने ही यह पहली बार नहीं किया है। हम इनका सम्मान पहली बार नहीं कर रहे हैं। समाज इनका सम्मान पहले ही कर चुका है। इनकी पुस्तकें समाज में पढ़ी जाती हैं। इनके चिंतन, लेखन शैली का लोहा सबने माना है। लेकिन हम फिर से यह इसलिये कर रहे हैं ताकि समाज को यह पता चलना चाहिये कि हमको क्या पढ़ना है। एक बार पाचन क्षमता ठीक हो जाये तब बाकी पढ़ा जा सकता है। जो कुछ अच्छा है उसे समाज के सामने लायेंगे। समाज को ऐसा तैयार करेंगे कि वह शरीर को पोषण करने वाला सार ग्रहण कर सके। सारासार विवेक बुद्धि जिस बातों से निर्माण होती है ऐसा साहित्य समाज में प्रचलित होगा तो वह समाज को प्रभावित करेगा। ऐसा साहित्य रचने वाला साहित्यकार समाज में मान्य होगा।

            यही काम करने के लिये साहित्य परिषद् है। साहित्य परिषद् विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम कर रही है। इसका ध्यान रखिये कि बहिर्मुख होकर काम करने पड़ते हैं, उस समय हम ठीक रास्ते पर चले। इसका ध्यान रहे कि हम क्यों कर रहे हैं।

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संस्कृति वत्सल सम्मान समारोह

पूजनीय सरसंघचालक डाॅ. मोहनराव भागवत का उद्बोधन

अभी यहां मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान का सम्मान किया गया है। सम्मान का अर्थ होता है जिम्मेदारी बढ़ना। जिस अपेक्षा से सम्मान किया जाता है, उन अपेक्षाओं पर खरा उतरना होता है। सम्मानित व्यक्ति को ध्यान रखना होता है कि वह अपेक्षित स्थान से नीचे न उतरे। 
   हमारी संस्कृति हमारी पहचान है। यह हमारी जगजननी है। उसने हमें विशिष्ट स्वभाव दिया है। जिसके आधार पर हमने विश्व को मार्ग दिखाया। विश्व का हर देश जब भी पतित हो लड़खड़ाया, सत्य की पहचान करने इस धरा के पास आया।

अभी यहां मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान का सम्मान किया गया है। सम्मान का अर्थ होता है जिम्मेदारी बढ़ना। जिस अपेक्षा से सम्मान किया जाता है, उन अपेक्षाओं पर खरा उतरना होता है। सम्मानित व्यक्ति को ध्यान रखना होता है कि वह अपेक्षित स्थान से नीचे न उतरे। 
   हमारी संस्कृति हमारी पहचान है। यह हमारी जगजननी है। उसने हमें विशिष्ट स्वभाव दिया है। जिसके आधार पर हमने विश्व को मार्ग दिखाया। विश्व का हर देश जब भी पतित हो लड़खड़ाया, सत्य की पहचान करने इस धरा के पास आया।
   बच्चों को स्वभाव का संस्कार माता से मिलता है। हमें संस्कार देने वाली भारतमाता है। हमारा संस्कार सबको जोड़नेवाला है। आज विश्व टूट रहा है। जोड़ने की बात करनेवाले भी जोड़ नहीं सकते हैं, क्योंकि  उनके पास संस्कार नहीं है। वे जोड़ने में विश्वास भी नहीं रखते हैं। उनका मानना है कि जो सबल है वही सफल है। वे एक दूसरे का गला काट कर अथवा दूसरे के पेट पर लात मार कर आगे बढ़ने में विश्वास रखते हैं।
   उनका मानना है कि विश्व की सब बातों का एक दूसरे से संबंध नहीं है। वे सौदे के अन्तर्गत विश्व को एकत्र करना चाहते हैं। इस प्रकार से एकत्रित आना आना स्थायी नहीं होता। पश्चिम के विचार में एक अधूरापन है। विश्व को एकता का विचार हमने केवल दिया ही नहीं, उस आधार पर एकत्र कर दिखाया भी है।
   वेद यही संदेश देते हैं कि सारे अच्छे विचार संसार में फैलाओ। अपने आचरण से संसार को शिक्षा दो। एतद्देश प्रसूतस्य.......। अच्छी बातों का अभ्यास करने से समाज का चरित्र बनता है। संस्कारों से अच्छा चरित्र बनाने का उपाय हमारे पास है। उसे जानबूझ कर भुलाने का प्रयास अंग्रेजों ने किया। उसके चलते हमने अपनत्व को हीनत्व मान लिया। कोई हीन है, कोई उच्च है का भेद हमारे यहां कभी नहीं रहा। 
   हम जीवसृष्टि से सीखने वाले लोग हैं। हम मानते हैं कि ईश्वर ने जिसको जितनी बुद्धि दी है जो परिस्थिति दी है वह उसी आधार पर जीता है। प्रत्येक अपनी मर्यादा में रहे। इससे संसार का संतुलन बना रहता है। इस कारण हमारा स्वभाव परस्पर विरोधी प्रकृति वालों के साथ चलने वाला है।
   हमारे जीवन का आधार धर्म है। प्रत्येक ने अपने धर्म का पालन करना चाहिये। राजा दिलीप को पुत्र प्राप्ति के लिये कामधेनु स्वरूप गाय की सेवा करने को कहा गया। एक दिन वे गाय के साथ वन में थे, तब एक सिंह ने गाय पर हमला किया। राजा दिलीप गाय की रक्षा के लिये आगे आये। प्रतिकार करने पर शेर ने कहा कि मैं जंगल का राजा हूँ। यहाँ मेरा नियम चलता है। गाय मेरा भक्ष्य है तुम बीच में न आओ। राजा ने कहा तुम्हारी बात सही है कि गाय तुम्हारा भक्ष्य है, लेकिन मेरा धर्म है कि प्रजा की रक्षा करना। इसलिये मैं गाय की रक्षा करूंगा। तुम्हारी भूख मिटाने के लिये मैं स्वयं को प्रस्तुत करता हूँ। तुम मुझे खाकर अपनी भूख शान्त करो। इससे अपने दोनों का धर्म रह जायेगा।
   इसके विपरीत पश्चिम मानता है कि युद्ध व प्रेम में सब जायज है। हम कहते हैं कि प्राणों के भय से भी धर्म का त्याग मत करो। धर्म का पालन हर परिस्थिति में अनिवार्य है। धर्म शाश्वत है। आत्मा नित्य है उसकी प्रताड़ना नहीं होनी चाहिये। जन्म मृत्यु तो होती रहती है।
   हमारी संस्कृति ने इन्हीं मुद्दों को हमारे जीवन में स्थायी किया है। उसके छोटे छोटे प्रतीक हैं, कार्यक्रम हैं जिनसे हमारा जीवन चलता है। उन प्रतीकों की पूजा, तीर्थयात्रा आदि से ये पुष्ट होता है। ऐसे वातावरण में जाने से मन मजबूत होता है। यह सही है कि केवल वातावरण में रहने से पूर्णता नहीं होती, पर वातावरण आवश्यक है। हमारी इस श्रद्धा को नष्ट-भ्रष्ट किया गया। इन पर श्रद्धा करनेवालों को अज्ञानी कह कर नकारा गया। श्रद्धा तर्क से नहीं अनुभव से आती है।
   अपनी परम्परा को समझ कर उसके अनुसार आचरण करना चाहिये। यह करते समय अंधश्रद्धा निर्माण न हो इसका ध्यान रखा जाना चाहिये। लेकिन प्रत्येक बात को तर्क के आधार पर मानने का चलन हो गया है। इसलिये न समझते हुए तर्क न मिलने पर श्रद्धा को समाप्त करना ठीक नहीं। इस प्रकार की अश्रद्धा समाज में फैलाना सबसे बड़ी अंधश्रद्धा है।
   श्रद्धा अपने आप से उत्पन्न नहीं होती। परिश्रम कर सत्य को जान लेने और चारों ओर दिखाई देने वाले माया मोह के विपरीत हृदय में धारण करने पर श्रद्धा निर्माण होती है।
   पश्चिमी विचारों के प्रभाव में अंधश्रद्धा के आधार पर अपनी श्रद्धा तोड़ने का काम हो रहा है। इसलिये ऐसे सम्मान की आवश्यकता हुआ करती है। जब कोई अपना कर्तव्य पूर्ण करता है तब उसका सम्मान करना पड़ता है, ताकि समाज को पता चले की रास्ता कौनसा है? छत्रपति शिवाजी ने मन की स्फुरणा से हिन्दू समाज को संगठित कर हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने का कार्य किया। सम्मान प्राप्ति के लिये उन्होंने काम नहीं किया था। लेकिन उस समय की परिस्थिति की आवश्यकता को देखते हुए समाज, समर्थ रामदास और जीजाबाई, गागाभट्ट, भूषण आदि ने आग्रहपूर्वक शिवाजी को राज्याभिषेक के लिये तैयार किया। 
   सामान्यतः विद्वान, कलाकार आदि राज्याश्रयी होते हैं और राजा उनका सम्मान करता है। लेकिन परिस्थिति के अनुसार उल्टी गंगा बहानी पड़ती है। प्रतिभाशाली लोग राजा का सम्मान करते हैं। यह सम्मान राजा का सम्मान करने लिये नहीं होता, समाज को दिशा देने के लिये किया जाता है।
   समाज को ऐसा सिंहासन चाहिये जो धर्म की रक्षा करे, प्रजा की रक्षा करे, पाप का खंडन करे, अन्याय अनीति का उच्छेद करे। ऐसा होने पर राजा का सम्मान किया जाता है, क्योंकि ऐसी भावना से काम करनेवाले शासनारूढ़ व्यक्ति चाहिये।
   यह भी ध्यान रखना चाहिये कि शासन केवल नीति बना सकता है। लेकिन समाज परिवर्तन नहीं कर सकता। ये हमारा काम है। हम अपने बच्चों को संस्कृति के विपरीत गलत शिक्षा देंगे तो शासन क्या करेगा। राज्य समाज को नहीं बदल सकता । अपितु समाज द्वारा दी दिशा पर राज्य चलता है। यह हमारा कर्तव्य है। शिवराजसिंह ने मध्यप्रदेश में करके दिखाया है। संस्कृति के अनुसार काम कर दिखाया है कि उसे किस प्रकार करना चाहिये। इसी कारण उनका सम्मान किया गया है।    
   हमारा कर्तव्य है कि हमारी वत्सला संस्कृति की वत्सलता के ऋणमोचन के लिये हम कार्य करें। इस संस्कृति ने ही हमें दुनिया में आदरणीय मनुष्य बनाया है। आज उसकी विपन्नावस्था है। फिर भी जब कोई भारतीय विदेश जाता है, तब उसे भारतीय होने के कारण आदर से देखा जाता है। हमे यह देखना चाहिये कि हम ऐसी संस्कृति को वापिस नाने के लिये क्या कर रहे हैं। हम अपनी माता के सुपुत्र हैं? हम समर्थ और योग्य हैं क्या? हमारी पीढ़ी की संतानें योग्य बन सके ऐसा परिवार चला रहे हैं क्या?
   आज अपने देश की पहचान पर, एकात्मता पर, अखंडता पर, आर्थिक-सामाजिक स्थितियों पर संकट है। इनको ठीक करने के लिये बाहरी उपाय किये जाते हैं। उनसे परिस्थिति कुछ सुधरी सी दिखायी देती है, पर स्थायी रूप से परिस्थिति सुधरती नहीं। अपनी स्वयं की प्रतिकार शक्ति बढ़ती नहीं।
   अपनी प्रतिकार शक्ति बढ़ाने का प्रयास होना चाहिये। धर्म का निर्णय लेने वाले सर्वहितेषी करूणावान लोग होते हैं। सर्वहितेषी एवं करूणावान होना विद्वानों के लिये साधारण बात होती है। क्योंकि विद्या के कारण उनका मस्तिष्क बुद्धि श्रेष्ठ होती है। उनका दायरा बढ़ा होता है। वे उचित अनुचित का निर्णय कर सकते हैं। ऐसे विद्वान किसी राज्य के मुख्यमंत्री को सम्मानित करना चाहते हैं, उसका उद्देश्य यही होता है कि समाज को यह संदेश जाये कि राज्य का काम धर्मरक्षण का होता है।
   राज्य शासन ने अपनी नीतियों से धर्म के मार्ग को प्रशस्त किया है, उस पर चलने का काम अपना है। उस पर चलने के लिये अपनी और अपने लोगों की योग्यता बढ़ाने के लिये प्रयत्न करना होगा। समाज की ओर से शासन द्वारा किये गये कार्य का उत्तर दिया जाना चाहिये। शासन की अपेक्षा के अनुरूप वे कार्य अपने घर, मोहल्ले, शहर में फलने फूलने चाहिये।

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स्वर्ण जयन्ती समारोह उद्घाटन कार्यक्रम

राज्यपाल पंजाब प्रदेश माननीय कप्तानसिंह सोलंकी

जिस साहित्य में राष्ट्रीयता नहीं हो वो साहित्य किस बात का। उन्होंने ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। अगर आप किसी समाज को देखना और उसके बारे में जानना चाहते हैं तो आप उस समाज के साहित्य को देखें। उन्होंने कहा कि आज का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज ही के दिन स्वातंत्र्य वीर सावरकर का निधन हुआ था और आज ही महर्षि वाल्मीकि की जयन्ती भी है। वीर सावरकर को याद करते हुए श्री सोलंकी ने कहा कि स्वतंत्रता के लिए उन्होंने इतनी बड़ी कुर्बानी दी, वह भी परिवार सहित दी। एक जन्म में दो जन्म के कारावास की सजा मिली। 1966 में जब उनका निधन हुआ उस समय वे देश के हालात से संतुष्ट नहीं थे। इसलिए जब हम उनकी जीवन गाथा को पढ़ेंगे तो हमें यह मालूम होगा कि मृत्यु उनको आई नहीं थी, मृत्यु उन्होंने खुद बुलाई थी। इसका एक कारण यह था कि देश की स्वतंत्रता के 18-19 वर्ष बीत जाने के बाद भी वह नहीं हुआ जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश चाहता था। जिसके लिए लिए लोगों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी, बलिदान दिया था।

जिस साहित्य में राष्ट्रीयता नहीं हो वो साहित्य किस बात का। उन्होंने ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। अगर आप किसी समाज को देखना और उसके बारे में जानना चाहते हैं तो आप उस समाज के साहित्य को देखें। उन्होंने कहा कि आज का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज ही के दिन स्वातंत्र्य वीर सावरकर का निधन हुआ था और आज ही महर्षि वाल्मीकि की जयन्ती भी है। वीर सावरकर को याद करते हुए श्री सोलंकी ने कहा कि स्वतंत्रता के लिए उन्होंने इतनी बड़ी कुर्बानी दी, वह भी परिवार सहित दी। एक जन्म में दो जन्म के कारावास की सजा मिली। 1966 में जब उनका निधन हुआ उस समय वे देश के हालात से संतुष्ट नहीं थे। इसलिए जब हम उनकी जीवन गाथा को पढ़ेंगे तो हमें यह मालूम होगा कि मृत्यु उनको आई नहीं थी, मृत्यु उन्होंने खुद बुलाई थी। इसका एक कारण यह था कि देश की स्वतंत्रता के 18-19 वर्ष बीत जाने के बाद भी वह नहीं हुआ जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश चाहता था। जिसके लिए लिए लोगों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी, बलिदान दिया था।
   भारत का प्राचीन गौरव और अस्मिता उसकी पहचान है। उस गौरव और अस्मिता को समाप्त करने की जो कोशिश एक हजार वर्ष तक होती रहीं। देश स्वतंत्र होने के बाद हमारे देश के मनीषी जो देश के प्रति भक्तिनिष्ठ थे, चाहते थे कि देश की अस्मिता और गौरव को कैसे बचाया जाए? उसी उद्देश्य को लेकर 27 अक्टूबर, 1966 में साहित्य परिषद् का गठन हुआ था। 
   विचार ही व्यक्ति को ठीक करता है। ये विचार साहित्य से आता है। सहित्य देश की अस्मिता को पीढ़ी बदलते वक्त एक पीढ़ी से से दूसरे पीढ़ी को हस्तानांतरित करता है। मनुष्य के शरीर के पीछे मन है, मन के पीछे बुद्धि है, बुद्धि के पीछे ईश्वर की शक्ति है। जिसे हम आत्मा कहते हैं। इसलिए आत्मा और बुद्धि को अगर कुशाग्र और प्रखर बनाना है तो साहित्य को अपनाना पड़ेगा। सम्पूर्ण व्यक्तित्व को बनाने के लिए बुद्धि की विशालता चाहिए और बुद्धि की विशालता के लिए अन्तःकरण की विशालता चाहिए जो साहित्य से ही आती है।
   साहित्य वह है जो लोक स्वर बनने की ताकत रखता है। साहित्य हमें ज्ञान के पथ से अनुभव के पथ पर पहुँचाता है और अनुभव के पथ से ज्ञान के पथ पर पहुँचाता है। श्रीमद्भगवत गीता और श्रीरामचरितमानस ऐसा ही उत्तम साहित्य हैं। साहित्य वह है जिसमें स्वदेश के प्रति आस्था का भाव हो, जिसमें साहित्यिक विरासत के प्रति श्रद्धा का भाव हो।
   आज साहित्य की गंगा विषैले जीवाणुओं से पंकिल हो गई है। ‘वाद’ के ‘कफ’ से विमर्श के ‘वात’ से और वामपंथियों के ‘पित्त’ से साहित्य पुरुष का कंठ अवरुद्ध हो गया है। अब साहित्य पुरुष दोनों भुजाएँ उठाकर भारतीय विद्या-परंपरा के ‘आस्था तत्व’ से गर्भित साहित्य की पुनः वापिसी की गुहार कर रहा है। साहित्य के मानस पुत्रों को इसका संजीवन तत्त्व वापिस करने का समय अब आ गया है। ऐसा साहित्य रचा जाए, जो भारत की मूलात्मा से जुड़कर विश्व मंगल का संदेश दे सके, जो दिलों को तोड़ने वाला नहीं, अपितु जोड़ने वाला हो। संस्कारों को नष्ट करने वाला न होकर उन्हें पुष्ट करने वाला हो। निश्चय ही ऐसा साहित्य आस्थामूलक साहित्य है। आस्थामूलक साहित्य की भारत की अपनी परंपरा है। इसे पुनर्प्रतिष्ठित करने के संकल्प से ही अखिल भारतीय साहित्य परिषद् अस्तित्व में है। 
   साहित्य परिषद् की 50 वर्षों की यात्रा अपनी सुदृढ़ नींव के संबल से पूर्ण करने में समर्थ हुई है। इस पावन प्रसंग पर उन आधारशिलाओं को स्मरण करना अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के कार्यकर्ताओं का अनिवार्य कर्तव्य है। उनमें से जो आज हमारे बीच नहीं है उनका पुण्य-स्मरण ही कर सकते हैं। लेकिन जो आज भी साहित्य परिषद् के आधार स्तम्भ और प्रेरणा पुरुष के रूप में सतत् कार्यरत् हैं, उनका अभिनन्दन कर गौरव का अनुभव कर रहे हैं।

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स्वर्ण जयन्ती समापन

राज्यपाल उत्तरप्रदेश माननीय राम नाईक

मैं साहित्य परिषद् के अनेक कार्यक्रमों में अतिथि के रूप में आता रहा हूँ। अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘चरैवेति चरैवेति’ की चर्चा करते हुए कहा कि अब में भी लेखक हो गया हूँ और इस बार एक लेखक के रूप में आपके बीच हूँ।

मैं साहित्य परिषद् के अनेक कार्यक्रमों में अतिथि के रूप में आता रहा हूँ। अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘चरैवेति चरैवेति’ की चर्चा करते हुए कहा कि अब में भी लेखक हो गया हूँ और इस बार एक लेखक के रूप में आपके बीच हूँ।
   25 दिसबंर का दिन पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय जी का जन्मदिन है। अटल जी एक अच्छे मनुष्य और श्रेष्ठ साहित्यकार भी हैं। अटल जी के साथ अपने संस्मरणों को उदधृत करते हुए उनकी महानता के बारे में बताया और कहा कि एक साहित्यकार को अच्छा मनुष्य होना आवश्यक है। यही बात मालवीय जी की है इसी कारण उन्हें महामना कहा गया। 
   इस प्रकार के आयोजनों से सिंहावलोकन होता है। आपने आज साहित्य को बढ़ावा देने वाले लोगों का सम्मान किया है, यह बहुत ही अच्छी बात है। इसमें पाठक वर्ग के प्रतिनिधि को भी जोड़ना चाहिये था।

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