कार्यकर्ता प्रशिक्षण

            मनुष्य के मन में सदैव सदैव प्रश्न रहते हैंए कुतुहल रहता है। कार्यकर्ताओं की अपनी अनेक समस्याएं भी रहती हैं। वे संगठित रूप में काम करने की आवश्यकता तथा संगठन का उद्देश्य जानना चाहते हैं। कार्यकर्ताओं के सामने साहित्य के बारे में संगठन का दृष्टिकोण स्पष्ट करने की आवश्यकता रहती है। कार्य क्या हैए किस प्रकार करना हैए यह बताना होता है। कार्यक्रम कौनसे करनाए कैसे करनाए क्यों करना है स्पष्ट करने की आवश्यकता होती है। इसके लिये साहित्य परिषद् कार्यकर्ताओं का चिंतन वर्ग तथा प्रशिक्षण वर्ग आयोजित करती है।

 १) युवा साहित्यकार शिविर : 

            आज के उपभोक्तावादी समय ने समाजए परिवार और रिश्तों में नकारात्मक सेंधमारी की है। छद्म धर्म.निरपेक्षताए तर्कहीन एक पक्षीय सांप्रदायिकताए भयानक आतंकवादए क्षेत्रीयता का भूतए संस्कृति को कुसंस्कृति बनाने का दुष्चक्रए इतिहास के साथ छेड़खानीए शिक्षा में विदू्रपता का दंशए कन्या भू्रण हत्याए स्त्री के प्रति दोहरे मापदंड और ऐसे ही अनेक मुद्दे आज सुरसा का मुँह बन सब कुछ लीलने को तत्पर हैं। ऐसे माहौल में साहित्य और साहित्यकार को अपनी ताकत की पहचान करनी होगी और इन सूक्ष्म आक्रमणों का जवाब सूक्ष्म साधनों से ही देना होगा। आन्तरिक और बाह्य संकटों से घिरी भारतीय राष्ट्रीय अस्मिता आज सार्थक परिवर्तन का मार्ग ढूँढ रही है। ऐसी परिस्थितियों में लेखकों की युवा पीढ़ी ही साहित्य के नई क्षितिज को छूकर उसे नई दिशा दे सकेगी।

            इसे ध्यान में रखते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने 21.22 जून 2008 को राष्ट्रीय युवा साहित्यकार शिविर का आयोजन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में किया। इस शिविर में 12 प्रदेशों के 48 स्थानों से 73 युवा साहित्यकारों ने शिविर में सहभागिता की। शिविर का केन्द्रीय विषय था . ष्संकटों से घिरी राष्ट्रीय अस्मिता और साहित्यकार का दायित्व।ष्

            इन्हीं तथ्यों के मद्देनजर कविताए कहानी तथा समालोचना पर व्यापक चर्चा अपेक्षित है। कविता की भाषा के साथ आज उसके कथ्य और मुहावरों में नया निखार लाने की आवश्यकता है। युवा कथाकारों को आज की तमाम समस्याओं को कथा में गूँथने के प्रयास करने होंगे। यही उनका राष्ट्र.बोध और राष्ट्र.प्रेम भी होगा और गल्प.साहित्य का नया सामाजिक दायित्व भी। नए आलोचकों की एक नई पीढ़ी को भी सक्रिय होने की आवश्यकता है।

            शिविर से पहले युवा साहित्यकारों से उनकी पाँच.पाँच रचनाएँ आमंत्रित की गयी थीं। उनका परीक्षण कर प्रशिक्षार्थियों का चयन किया गया। चयनित युवा साहित्यकार को शिविर में अपनी रचना पढ़ कर सुनानी थी और विद्वान प्रशिक्षकों द्वारा उसकी समालोचना की जानी थी।

            उद्घाटन.सत्र के मुख्य वक्ता ख्यातिलब्ध आलोचक एवं गांधीवादी चिंतक प्रोफेसर रामेश्वर मिश्र पंकज ने युवा प्रशिक्षार्थियों को संबोधित करते हुए अपने गंभीर व्याख्यान में शास्त्रों के अध्ययन पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आवश्यक नहीं कि जो पुराना होए वही अच्छा हो या जो कुछ नया होए वह खराब ही हो। हमें बिना अध्ययन के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए। इस सिद्धांत के प्रतिपादन के लिए काव्य अनुभूति आवश्यक है पर अध्ययन उसे परिष्कृत करता है। पंकज जी ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल का उल्लेख करते हुए कहा कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में शुक्लजी ने आलोचना को विधा का स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य शास्त्र का अध्ययन कर वैश्विक व सार्वभौम तथ्यों की रचना की। आचार्य शुक्ल की चिंतन प्रवृत्ति पुरातन एवं आधुनिकता का सामंजस्य है और उसमें तुलसी तथा कबीर की तरह लोकमंगल की भावना निहित है।

            प्रो.  मिश्र ने वर्तमान साहित्य एवं साहित्यकारों की चर्चा करते हुए कहा कि आज भी साहित्य क्षेत्र में माक्र्सवादी प्रभुत्व कायम है। हिन्दी में कई सार्थक नाम हैं पर जनसंचार के माध्यमों में उनका अधिक उल्लेख नहीं मिलता। शिक्षा की बात करते हुए उन्होंने कहा कि मिशनरी स्कूलों में हिन्दुत्व विरोधी शिक्षा दी जा रही है। भारत के इतिहास को गलत पढ़ाया जा रहा है। पण्डित मदनमोहन मालवीय ने भारतीय शिक्षा पद्धति को हिन्दुत्व से जोड़ा था। आर्य समाज के विश्वविद्यालयों में संस्कृत की उच्च शिक्षा प्रदान की जा रही है। हमें अध्ययनए चिंतन और मनन द्वारा अपनी शक्ति को पहचानना है। साहित्य सदा वर्तमान रहता है। सैंकड़ों . हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई अमर कृतियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।

            प्रो.  मिश्र ने अंत में प्रशिक्षार्थी युवा साहित्यकारों से अपेक्षा की कि सत्य निष्ठाए राष्ट्रभक्ति आदि गुण साहित्यकार के लिए परम आवश्यक हैए इन्हें जीवन में स्थान अनिवार्य रूप से देना चाहिये।

            समीक्षात्मक विवेचना सत्ररू इस सत्र के प्रशिक्षक एवं मुख्य वक्ता थे वरिष्ठ आलोचक डॉण् कन्हैया सिंह। डॉण् कन्हैया सिंह ने आलोचना कर्म को एक प्रतिष्ठित रचनात्मक विधा बताते हुए कहा कि प्रारंभ में आलोचना केवल गुण.दोष विवेचन तक सीमित थी। 20वीं शताब्दी में पंण् रामचन्द्र शुक्ल से वास्तव में आलोचना का आरंभ हुआ। यह काल देश में नवजागरण का काल था। शुक्ल जी वैश्विक और मानवतावादी थे पर देश की संस्कृतिए सभ्यताए धरोहरोंए पर्वतोंए नदियोंए उपत्यकाओं आदि के प्रति प्रेम भी अनिवार्य मानते थे। शुक्ल जी का मूल सूत्र था ष्लोकमंगलष् जिसके प्रतीक तुलसी के राम थे।

            कथा.साहित्य सत्ररू कथा सत्र के प्रशिक्षक एवं मुख्य वक्ता थे सुप्रसिद्ध कथाकार श्री नरेन्द्र कोहली। उन्होंने सती और शिव की कथा सुनाते हुए कहा कि यह पति.पत्नी की कहानी नहीं हैए आराध्य की कहानी है। हमारा आराध्य हमारा देश होना चाहिए। जो अपने देश के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकताए उसे साहित्यकार कहलाने का कोई अधिकार नहीं। हमारा चिंतन मौलिक होना चाहिए।

            कविता सत्ररू सत्र के प्रशिक्षक एवं मुख्य वक्ता थे ख्यातिलब्ध साहित्यकार एवं कविता मर्मज्ञ डॉण् यतीन्द्र तिवारी। श्री तिवारी ने अपने उद्बोधन में कहा कि कवि और कविता के लिए आवश्यक है कि कवि अपने अग्रज कवि मनीषियों के संपर्क में आता रहे तथा निरंतर अभ्यास तथा परिष्कार करता रहे। तभी उत्कृष्ट कोटि का सृजन संभव होता हैए क्योंकि कविता भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है।

 

२) बाल प्रशिक्षण वर्ग : 

            ऐसा माना जाता है कि साहित्य रचना ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा के कारण संभव होती है। लेकिन यह भी सही है कि इच्छुक को उचित समय पर साहित्यिक विधा का प्रशिक्षण दिया जाता है तो उनकी प्रतिभा निखर सकती है। प्रशिक्षण के अभाव में अनेक प्रतिभाएं निखर नहीं पाती। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ऐसी संभावित प्रतिभाओं को ढूँढ कर प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करती है। माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के ऐसे विद्यार्थीए जो अपने विद्यालय की पत्रिका में कविताए कहानीए निबंध आदि लिखते हैं के लिये प्रतियोगिता आयोजित कर पुरस्कृत किया जाता है और पुरस्कृत विद्यार्थियों को विधा वार लेखन का प्रशिक्षण दिया जाता है।

            उदाहरणार्थ ऐसा ही आयोजन ग्वालियर में बाल.साहित्यकारों के लिये किया गया। विद्यालयों में सम्पर्क कर ऐसे विद्यार्थियों को पंजीकृत किया गया जो अपनी विद्यालय की पत्रिका में कथाए कहानीए कविताए निबंध अथवा अन्य प्रकार का लेखन करते हैं। पंजीकृत बाल लेखकों की संख्या 2863 रही। एक बड़े उद्यान में छुट्टी के दिन प्रतियोगिता रखी गयी। उद्यान में तीन चित्रों के कई होर्डिंग स्थान.स्थान पर लगाये गये थे। उन चित्रों के आधार पर बाल.साहित्यकारों को तत्काल कथा अथवा कहानी लिखनी थी। सभी ने निश्चित समय में अपनी रचना तैयार कर ली। परीक्षण के उपरान्त 150 बच्चों का चयन कर उन्हें पुरस्कृत किया गया। पुरस्कृत 150 बाल.साहित्यकारों को फिर एक बार बुलाया गया और कहानी तथा कविता विधा का प्रशिक्षण दिया गया। इस प्रतियोगिता तथा प्रशिक्षण के पश्चात् इन बालकों की साहित्यिक रुचि अधिक वृद्धिंगत हुई।

 

३) प्रश्न मंच : 

इसी प्रकार साहित्य के अध्ययन के प्रति प्रोत्साहित करने व प्रेरणा देने के निमित्त प्रश्न मंच व प्रतियोगिताओं को देश भर में आयोजन किया जाता है। प्रतिवर्ष रामचरित मानस में से 100 प्रश्नों का प्रश्नपत्र बना कर विद्यार्थियों की परीक्षा ली जाती है और बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया जाता है। इससे विद्यार्थी रामायण और रामचरित मानस पढ़ने में रूचि लेते हैं। इसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द आदि के जीवन पर प्रश्नपत्र तैयार कर प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इससे विद्यार्थियों की रूचि पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त साहित्य अध्ययन के प्रति बढ़ी है।

 

४) साहित्यकार प्रशिक्षण वर्ग : 

            18.19 अक्टूबर 2012 को भोपाल में सर्वभाषा साहित्यकार सम्मान समारोह के साथ साहित्यकार प्रशिक्षण वर्ग का भी आयोजन किया गया। इस प्रशिक्षण वर्ग में 15 प्रदेशों के 82 स्थानों से 205 साहित्यकार वर्ग में उपस्थित रहे। साहित्य तीन विधाओं . 1ण् कविताए 2ण् उपन्यासध्कथाए 3ण् ललित लेखन के प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी थी। कविता विधा पर प्रशिक्षण कक्षा की अध्यक्षता समालोचक डॉ.  मथुरेशनन्दन कुलश्रेष्ठ जयपुर ने की तथा प्रशिक्षण दिया श्री रवीन्द्र शुक्ल झांसी ने। ललित लेखन विधा कक्षा की अध्यक्षता डॉ.  रामस्वरूप खरे उरई ने की और प्रशिक्षक थे डॉ.  देवेन्द्र दीपक भोपाल। उपन्यास.कथा कक्षा की अध्यक्ष थी प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ.  मुदुला सिन्हा दिल्ली और प्रशिक्षक थे कहानीकार श्री जगदीश तोमर ग्वालियर।

 

५) चिंतन वर्ग : 

            राष्ट्रीय पदाधिकारी तथा प्रदेश में संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे कुछ प्रमुख कार्यकर्ताओं का चिंतन वर्ग 7.8 सितम्बर 2013 को हरिद्वार में उत्तम स्वामी महाराज के आश्रम में आयोजित किया गया। वर्ग में 77 कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था। उद्घाटन सत्र के अलावा हमारा अधिष्ठानए कार्यक्रमए कार्यकर्ताए संगठन और आत्मावलोकन विषय चर्चा के लिये रखे गये थे। उसके पश्चात् सवांद के लिये एक विशेष सत्र था। प्रशिक्षण वर्ग में हमारा अधिष्ठानए संगठनए कार्यकर्ताए कार्यक्रम विषयों पर विस्तृत चर्चा की गयी।

             आत्मावलोकन सत्ररू इस सत्र में एक प्रश्नपत्र सबको दिया गया था। जिसके उत्तर उन्हें हाँ अथवा ना में प्रश्नपत्र पर ही देने थे और प्राप्त अंकों के आधार पर स्वयं का परीक्षण करना था। यह पहले से बता दिया गया था कि उनके उत्तर किसी के सामने नहीं आयेंगे। ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह था कि कार्यकर्ता स्वयं का सही मूल्यांकन करे और पूछे गये प्रश्नों पर बाद में भी विचार करता रहे तथा अपने में सुधार की प्रक्रिया जारी रखे। यह प्रयोग सबको बहुत अच्छा लगा।

 

६) प्रदेश अध्यक्ष एवं महामंत्री वर्ग : 

            परिषद् के प्रमुख पदाधिकारियों की परिषद् के प्रति समझ बढ़ानेए कार्य को अधिक गति देनेए कार्यक्रमों का उद्देश्य स्पष्ट करनेए कार्यक्रमों के परिणाम आदि के बारे में विस्तृत चर्चा करने के लिये प्रदेश के अध्यक्ष एवं महामंत्री तथा तत्सम कार्यकर्ताओं का वर्ग गुजरात प्रदेश के आनन्द में 29.30 दिसंबर 2019 को आयोजित किया गया।

            परिषद् में प्रदेश अध्यक्षों व महामंत्रियों का यह पहला ही वर्ग था। प्रत्येक सत्र में विषय प्रवर्तन के पश्चात् प्रत्येक प्रतिभागी को चर्चा में सहभागी होने की अनिवार्यता रखी गयी थी। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किये जाने वाले प्रत्येक कार्यक्रम क्यों किया जाता हैए उसमें हमें क्या करना चाहियेए क्या परिणाम अपेक्षित होने चाहियेए प्राप्त परिणामों का सदुपयोग क्या किया गयाय इस पर चर्चा की गयी।

 

७) क्षेत्रीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग : 

            2019 में क्षेत्रीय स्तर पर कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन किया गया जिसमें प्रदेश पदाधिकारियों के अतिरिक्त चुने गये कार्यकर्ताओं को बुलाया गया था। पहला प्रशिक्षण वर्ग मुंबई में हुआ जिसमें 58 कार्यकर्ता महाराष्ट्रए मध्यप्रदेशए गुजरातए छत्तीसगढ़ प्रदेश से थे। दूसरा वर्ग कोटपुतली.राजस्थान में हुआए जिसमें 124 कार्यकर्ता दिल्लीए राजस्थानए हिमाचलए हरियाणा और जम्मू.कश्मीर प्रदेश से थे। तीसरा वर्ग झारसगुड़ा.झारखण्ड में हुआ जिसमें 13 कार्यकर्ता बिहारए उड़ीसाए बंगाल और झारखण्ड से थे। चैथा वर्ग हरदोई.उत्तरप्रदेश में हुआ जिसमें 152 कार्यकर्ता उत्तरप्रदेश तथा उत्तराखण्ड प्रदेश से थे।

            इनमें से प्रत्येक प्रशिक्षण वर्ग दो दिन का था। सैद्धान्तिक भूमिकाए कार्यकर्ता निर्माणए कार्यक्रम योजनाए आत्ममूल्यांकन तथा मुक्त चिंतन के सत्र रखे गये थे। वरिष्ठ पदाधिकारी प्रशिक्षण देने के लिये उपस्थित रहे।

 

८) युवा प्रशिक्षण वर्ग : 

            महाराष्ट्र के नासिक में देश भर से 22 युवा कार्यकर्ताओं को भविष्य के जिम्मेदार पदाधिकारियों के रूप में विकसित करने के निमित्त दो.दिवसीय वर्ग का आयोजन किया गया। परिषद् में कार्य करते हुए उनके अनुभवों के बारे में पूछा गया। परिषद् के कार्य और हुए कार्यक्रमों के बारे में उनके विचार जाने गये तथा उनके मन में भविष्य की परिषद् की क्या संकल्पना है पर संवाद किया गया। इस वर्ग से इन युवा कार्यकत्ताओं को जिम्मेदारी का अहसास हुआ और वे अधिक निष्ठा व सक्रियता से कार्य करने लगे।

 

९) प्रान्तीय कार्यकर्ता अभ्यास वर्ग : 

            प्रत्येक प्रदेश इकाई से अपेक्षा है कि वे प्रतिवर्ष प्रमुख कार्यकर्ताओं का अभ्यास वर्ग आयोजित करें। केन्द्र की प्रदेश इकाई से अपेक्षा रहती है अभ्यास वर्ग में प्रदेश पदाधिकारीए तत्सम कार्यकर्ता तथा सक्रिय इकाई से दो कार्यकर्ता बुलाया जाये। 11 प्रदेशों में इस प्रकार के वर्ग आयोजित होना प्रारम्भ हो चुका है। भविष्य में संभागों तक इस प्रकार के अभ्यास वर्ग करने का विचार है।

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