सम्मेलन

  • नारी साहित्यकार सम्मेलन: 

    भारत में प्राचीन काल से नारी को पूज्य  व शक्ति का प्रतीक माना गया। यहां तक कहा गया है कि  ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।’ भारत में नारी की स्वतंत्रता, शिक्षा, बुद्धिमत्ता आदि को लेकर कभी भी शंका नहीं रही। परन्तु पश्चिम देशों में नारी को वह सम्मान प्राप्त नहीं था। वहां शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बाद नारी समाज में जाग्रति आयी। नारी अपनी दुर्दशा के प्रति जागरूक हुई और परिणामस्वरूप अपनी स्थिति और दुर्दशा से बाहर निकलने के लिये सामाजिक समता, समानता व अधिकारों की रक्षा के लिये कई प्रकार के आंदोलन खड़े किये। भारत में पढ़े-लिखें लोगों ने अपने देश की संस्कृति व परिस्थिति को जाने बिना उन आंदोलनों को यथावत अपना कर नारी स्वतंत्रता का शोर मचाना शुरू कर दिया। 
   नारी साहित्यकारों की भूमिका आदि विषयों पर चिन्तन मनन करने के लिये महिला साहित्यकारों का सम्मेलन एवं विचार संगोष्ठी भोपाल में आयोजित की गयी। जिसमें देश भर की 58 महिला साहित्यकारों की सहभागिता रही। ख्यातनाम महिला साहित्यकारों का एक साथ एक मंच पर उपस्थिति होने का संभवतः यह पहला ही अवसर था। सम्मेलन का उद्घाटन मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री रामेश्वर ठाकुर ने किया तथा परिषद् की उपाध्यक्ष एवं प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. मृदुला सिन्हा ने मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थिति साहित्यकारों को संबोधित किया। विभिन्न चर्चा सत्रों में मुख्य विषय पर उपन्यासकार - 1. डॉ.  नीरजा माधव वाराणसी, 2. डॉ.  क्षमा कौल जम्मू, 3. डॉ.  चन्द्रकान्ता गुड़गांव; समीक्षक 1. डॉ.  मधु पन्त दिल्ली, 2. डॉ.  शेषारत्नम् विशाखापत्तनम्, राजस्थान साहित्य अकादमी की निदेशक डॉ.  अजित गुप्ता, बाल न्यायालय की मनोनीत अध्यक्ष डॉ.  रीता सिंह कुल्लू, साहित्य परिक्रमा की संपादक श्रीमती क्रांति कनाटे ने विस्तार से अपनी बात रखी। 
   

  • साहित्यिक पत्रिका के संपादकों का सम्मेलन: 

    साहित्यिक पत्रिकाओं का भारत के समाज जीवन के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। साहित्यिक पत्रिकाओं ने लोगों को सुरुचि सम्पन्न बनाने में अहम भूमिका निभायी है। परन्तु कालान्तर में एक-एक कर लगभग सारी स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं अथवा बंद होने के कगार पर हैं। जो चल भी रही हैं वे स्तरीय नहीं हैं। इसके अलावा यह बात भी चिन्ता उत्पन्न करने वाली है कि पत्रिकाओं में साहित्य, भाषा और पत्रिका में संकलित सामग्री पर आवश्यक ध्यान नहीं दिया रहा है। अतः इन सारी बातों पर चर्चा करने के लिये साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादकों का दो-दिवसीय सम्मेलन दिल्ली में 12-13 दिसंबर 2009 को आयोजित किया गया। जिसमें 8 भाषाओं की 46 पत्रिकाओं के सम्पादक उपस्थित रहे। सम्मेलन में साहित्यिक पत्रिकाओं की दशा और दिशा पर गहन चिंतन हुआ। पत्रिकाओं और संपादकों का सामाजिक दायित्वबोध, भाषा-शुद्धि, साहित्यिक पत्रिकाओं की सामग्री और साहित्यिक पत्रिकाओं की समस्या पर गहन मंथन हुआ। 
   उद्घाटन सत्र के पश्चात् दो सत्र हुए। डॉ.  परशुराम सिंह आरा-बिहार की अध्यक्षता में आयोजित प्रथम सत्र का विषय था ‘हमारा रचना समय हमारी आकांक्षाएं। द्वितीय सत्र का विषय था ‘अखिल भारतीय दृष्टिकोण के विकास में साहित्यिक पत्रिकाओं का योगदान।’ इस सत्र की अध्यक्षता की डॉ.  शत्रुघ्न प्रसाद पटना ने की। तीसरा सत्र श्री आनन्द मिश्र अभय लखनऊ की जिसमें पाठकीय अभिरुचि के परिष्कार में साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका पर चर्चा हुई। चैथे सत्र का विषय था ‘भारतीय भाषाओं के संरक्षण की चुनौती और पत्रिकाओं की भूमिका।’ श्री सुबास षडंगी भुवनेश्वर ने अध्यक्षता की। 

 

  • शोध निदेशकों का सम्मेलन: 

    साहित्य में शोध की प्रक्रिया निरन्तर चलती है। प्रतिवर्ष न जाने कितने शोधार्थी पी.एचडी. करते हैं, न जाने कितने एम.फिल. करते हैं। फिर भी ऐसा लगता है कि शोध के माध्यम से साहित्य को नई ऊर्जा और दिशा मिलनी चाहिये थी, वह अनुभव में नहीं आ रही है। यह भी ध्यान में आ रहा है कि शोध के विषय निश्चित है। कतिपय साहित्यकार हैं जिनके साहित्य पर बार-बार शोध कार्य किया जाता है। एक मुद्दा यह भी है कि वास्तविक शोध के नाम पर साहित्यकार के साहित्य को एक निश्चित खांचे में बांध जाता है। शोध से तो भ्रमों का निराकरण होना चाहिये, परन्तु देखने में आ रहा है कि निराकरण की बात तो दूर रही जानबूझ कर भ्रम उत्पन्न किय गये हैं और अभी भी किये जा रहे हैं।
   उपरोक्त बातों पर शोध निदेशकों के विचार जानने और शोध को नई दिशा देने के बारे में चर्चा करने के निमित्त साहित्य क्षेत्र में शोध कार्य का निर्देशन करने वाले निदेशकों का सम्मेलन आगरा में 5-6 सितंबर 2014 को आयोजित किया गया। उपस्थित 34 शोध निदेशकों ने साहित्य परिषद् द्वारा किये जा रहे प्रयासों, नये-नये साहित्यिक विषयों पर की गयी चर्चा, शोध आलेख व उनके प्रकाशन की सराहना व प्रशंसा की। दो दिन तक गंभीर व गहन चर्चा कर शोध निदेशकों के लिये दिशा निर्देश तैयार करने पर सहमति प्रकट की।

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